नर्मदा तीरे

बचपन से नर्मदा के नजदीक रहने के कारण इस नदी से प्रेम और अपनापन होना स्वाभाविक था। तीर्थ क्षेत्र मान्धाता में रहने से एक भक्ति भाव भी पनपा। जीवनदायिनी माँ नर्मदा हमेशा से मुझे विस्मित करती रही। बरसात में जब बाढ़ आती थी तो विकराल रूप के दर्शन कराती और फिर बरसात के बाद निर्मल रूप के। जहाँ भी मैं गया नर्मदा के प्रति एक अलग ही आकर्षण हमेशा रहा। यहाँ तक की अपनी एक नौकरी केवल उद्गम स्थान के पास होने के कारण की।

वो समय भी अद्भुत था। अमरकंटक के वन प्रान्तर में जब पहली बार उद्गम स्थल पर माँ नर्मदा के दर्शन किये तो भाव विव्हल सा हो गया। उसके बाद जबलपुर और आसपास की यात्रा के दौरान नर्मदा के भिन्न भिन्न रूपों में दर्शन हुए। बड़ा अचरज हुआ जब डिंडौरी के पास एक छोटी सी धारा देखी नर्मदा की। हमने तो कभी इस रूप में माँ के दर्शन ही नहीं किये। हमने तो हमेशा विस्तृत, विराट रूप ही देखा है।

पढ़ा तो था कि नर्मदा मध्यप्रदेश की जीवनरेखा हैं। पूरे मध्यप्रदेश को पार करके गुजरात में खम्बात की खाड़ी में अरब सागर में समा जाती हैं। बचपन से ही नर्मदा वस्तुतः हमारी जीवन रेखा रही। पिताजी की नौकरी ही नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण में थी। तो वो तो आजीवन अपने को नर्मदा का अनुग्रही मानते रहे। हमारे खेल, कौतुक, त्यौहार, उत्सव, छुट्टियों सब मे नर्मदा भागीदार थी।

मामा से पढ़ने की प्रेरणा मिलती रही। उन्ही से जाना की कोई अमृतलाल वेगड़ हैं जिन्होंने नर्मदा परिक्रमा की और उन अनुभवों को लिपिबद्ध किया। उनकी परिक्रमा खण्ड में होती थी। जब समय मिला तब निकल लिए और कुछ दिनों में वापिस घर आ गए। अगली बार उसी स्थान से परिक्रमा प्रारंभ होती थी जहाँ से पिछले बार छोड़ी थी। मामा हमेशा बोलते की ऐसा कुछ मुझे भी करना है।

मुझे ये बात बड़ी रोचक लगती थी कि सहूलियत से समय भी निकाला और खण्ड खण्ड में पूर्ण परिक्रमा भी हो गई। मैं भी नदी, तीर्थ और वन प्रान्तर में रहकर प्रकृति प्रेमी होने का अभिमान कर लेता हूँ और इस तरह के प्रकृति दर्शन अभियान मुझे हमेशा से रोमांचित करते हैं। मेरे मन में भी ऐसा ही कुछ करने की इच्छा प्रबल होती रही। किन्तु कभी योग ही नहीं बना।

हमेशा से एक चाह थी की वेगड़ जी का लिखा यात्रा वृत्तांत “सौंदर्य की नदी नर्मदा” पढूं। काफी भटकने के बाद अंततः वो भी मिल ही गया। जब पढ़ना प्रारंभ किया तो उसमें खो सा गया। इतना सरल लेकिन मोहक वर्णन हैं नर्मदा प्ररिक्रमा का, लगता हैं आप साथ ही यात्रा कर रहे हो।

पढ़ते पढ़ते एक बात महसूस हुई जो उन्होंने उधृत भी की हैं कि नर्मदा घाटी में जो बांध बन रहे हैं उनसे नर्मदा का स्वरूप ही बदल जायेगा। साथ ही वो ये भी लिखते हैं कि मैं भाग्यशाली रहा कि मुझे नर्मदा के पुरातन काल वाले ही दर्शन हुए। तीन बड़े बांधों का निर्माण तो हमारे नगर के आसपास ही हो रहा था जिसमें से एक तो बिल्कुल तीर्थ क्षेत्र ओम्कारेश्वर में ठीक द्वीप से पहले था। एक अजीब सी उदासी ने घर कर लिया। मैं तकनीकी क्षेत्र से सम्बंधित होने से इन जल ऊर्जा संयंत्रों पर बड़ा गर्व महसूस करता था। इनकी वजह से होने वाले भौगोलिक परिवर्तन पर कभी ध्यान ही नहीं गया।

बहरहाल जो बात वेगड़ जी लिख गए थे उसका असर अब देखने में आता हैं। भर गर्मी में भी कभी नर्मदा को हमने ऐसे स्वरूप में नहीं देखा जैसा अब देख रहे हैं। सुखी हुई धारा में नर्मदा का पाट एकदम उजड़ा हुआ नज़र आता हैं। ओम्कारेश्वर में जो अलौकिक सौंदर्य था वो भी बांध की वजह से फीका पड़ गया। पहले नर्मदा की गहराई नहीं थाह पाते थे और अब सारे पत्थर दिख जाते हैं। जिन घाटों पर हम नहाने का सोच भी नहीं पाते थे वो सब उथले होकर सूखे पड़े हैं और नर्मदा वहां से दूर हो गई।

ख़ैर, प्रगति की कीमत परिवर्तन से ही चुकती हैं। लेकिन क्या ये परिवर्तन नैसर्गिक सौंदर्य की कीमत पर करना ही आवश्यक हैं? क्या विदेशों में नदियों पर बांध नहीं बने हैं उनका नैसर्गिक सौंदर्य बरकरार रखते हुए? एक और भी हैं जो नदियों का स्वरूप बदलने के लिए दोषी है, स्वयं हम। हमने नदियों को माता तो माना लेकिन कभी उसका रख रखाव उस तरह से नहीं किया। औद्योगिक कचरा, आवासीय और धार्मिक गन्दगी हमने जी खोल कर नदियों में बहाई। जिन देशों में नदी को केवल नदी माना उन नदियों की स्थिति हमारी गंगा, यमुना, नर्मदा से लाख गुना अच्छी है। गलतियां बहुत हुई हैं हम सब से लेकिन माता की यही बात अच्छी है कि वो अपने बच्चों को गलती सुधारने का अवसर अवश्य देती हैं।

आइए हम सब इस बात की गंभीरता को समझे कि इन नदियों का अस्तित्व क्यों हमारे अस्तित्व के लिए अत्यावश्यक हैं और क्यों इन्हें जीवनरेखा कहा जाता हैं। ऐसा न हो कि इनका नाम और सौंदर्यपान हमें केवल इसी तरह किताबों में पढ़ने को मिले।

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